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जब तुमको मैं मिल गया हूं और तुमने मुझे अपना मान लिया है तो फिर चिंता क्यों करती हो ।

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जब तुमको मैं मिल गया हूं और तुमने मुझे अपना मान लिया है तो फिर चिंता क्यों करती हो ।  मैं हूं न ! ये संसारिक सुख दुख तो प्रारब्धबस आता जाता रहता है , हमेशा नहीं रहता । प्रारब्ध है हस के भोगों और आगे बढ़ो , सब समय एक जैसा नहीं रहता , अप डाउन होता रहता है प्रारब्ध के कारण , चिंता मत करो । चिंता तो तभी होती है जब किसी जीव को अपने गुरू और ईष्ट पर भरोसा नहीं है । हरि गुरू किसी को दुख नहीं देते हैं ।अरे वो तो कृपालु है , हमेशा कृपा हीं करते हैं, अंदर ही अंदर संभालते रहते हैं , शरणागत का योग क्षेम वहन करने का जिम्मेदारी उनका है , तुम क्यों चिंता करते हो । भगवान और गुरू में मन लगाना तुम्हारा काम है वांकी सब हम पर छोड़ दो । :- श्री महराज जी , मनगढ़ धाम ।

गोलोक का वर्णन

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चलिए गोलोक‌ के बारे में जानते हैं आज ।। गोलोक का वर्णन विस्तृत रूप से :- ब्रह्मादि देवताओं द्वारा गोलोकधाम का दर्शन के साथ हम भी भाव‌ देह से वहां चलते हैं ।  भगवान विष्णु द्वारा बताये मार्ग का अनुसरण कर देवतागण ब्रह्माण्ड के ऊपरी भाग से करोड़ों योजन ऊपर गोलोकधाम में पहुंचे। गोलोक ब्रह्माण्ड से बाहर और तीनों लोकों से ऊपर है। उससे ऊपर दूसरा कोई लोक नहीं है। ऊपर सब कुछ शून्य ही है। वहीं तक सृष्टि की अंतिम सीमा है। गोलोकधाम परमात्मा श्रीकृष्ण के समान ही नित्य है। यह भगवान श्रीकृष्ण की इच्छा से निर्मित है। उसका कोई बाह्य आधार नहीं है। अप्राकृत आकाश में स्थित इस श्रेष्ठ धाम को परमात्मा श्रीकृष्ण अपनी योगमायाशक्ति से (बिना आधार के) वायु रूप से धारण करते हैं। उसकी लम्बाई-चौड़ाई तीन करोड़ योजन है। वह सब ओर मण्डलाकार फैला हुआ है। परम महान तेज ही उसका स्वरूप है। प्रलयकाल में भी वहां श्रीकृष्ण अपने जनों के साथ परिकरों के साथ रहते हैं । वो गोलोक गोप-गोपियों से भरा रहता है। गोलोक लोक से सटा साकेतपुरी है , उसके नीचे पचास करोड़ योजन दूर दक्षिण में वैकुण्ठ और वामभाग में शिवलोक है। वैकुण्ठ व शिवलो...

प्रश्न -भगवद् प्राप्ति क्या है ?

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प्रश्न -भगवद् प्राप्ति क्या है ?  उत्तर :- जीवात्मा का माया से निवृत्ति तथा भगवान में प्रवृत्ति ही भगवद् प्राप्ति का मूल आधार है , दुसरे शब्दों में संसार से मोह ( attachment ) समाप्त हो जाना , यानि संसार से पूर्ण वैराग्य और भगवान में सेंट पर्सेंट मन का अटैचमेंट हो जाना भगवद् प्राप्ति है ।  जीवात्मा जब माया से मुक्त हो जाता है तो उसको मायिक गुणों तथा स्वरूप से मुक्ति मिल जाती है , स्वरूपावरी का माया तथा गुणावरी का माया दोनों से मुक्ति होते ही मायिक दुर्गुणें चली जाती है और जीव को दैविक गुण , भगवदिय गुण यानि ईश्वरीय गुण , ईश्वरीय संपत्तियां , ईश्वरीय आनंद सदा को प्राप्त हो जाता है इसी को भगवद् प्राप्ति कहते हैं ।  स्वरूपावरी का माया मिटने पर जीव का देहाभिमान समाप्त हो जाता है , वो स्वयं को देह नहीं मानता , वो देहभाव से उपर उठ जाता है मानसिक स्तर पर तथा गुणावरी का माया समाप्त होते ही त्रिगुण ( सतोगुण , रजोगुण तथा तमोगुण ) से मुक्ति मिल जाती है , पंचकोष समाप्त हो जाते हैं , पंचकोष भस्म होते ही मायिक दुर्गुणें समाप्त हो जाती है । गुणावरी का माया मिटते ही संसार से वैराग्य तथा म...

भगवद् प्रेमी को पागल ही कहा गया है संसार में ।

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भगवद् प्रेमी को पागल ही कहा गया है संसार में । जब लोग वाग पागल कहने लगे हमें और समझने लगे  , हमारा विरोध करने लगे तथा मजाक उड़ानें लगे तब समझना चाहिए कि हम सही रास्ते पर है । भगवद् प्रेमी संसार से अपमान कि ही अपेक्षा रखता है । जितना अपमान मिलेगा उतना अहंकार जाएगा और दीनता का भाव उतरेगा मन में नेचुरली । जितनी दीनता का भाव उतरेगा मन में उतने ही भगवद् प्रेम का आंसू आएंगे , जितना आंसू आएंगे उतना ही अंत:करण का कलमस धूलेगा , जितना कलमस धूलेगा उतना अंत:करण शूद्ध होगा । और जितना अंतःकरण शुद्ध होगा उतना अंतःकरण दिव्य बना दिया जाएगा गुरू द्वारा और  उतना हीं भगवद् संबंधित बिषयों का प्रत्यक्ष अनुभव होगा हमें  ।  इसलिए संसार से अपमान की ही अपेक्षा रखनी चाहिए, संसार से जो सम्मान कि अपेक्षा रखें उसे साधक व भक्त नहीं कहा जा सकता । ऐसे भी संसार किसी को अच्छा नहीं कहता है । मतलव के अनुसार ही संसार झूकता है किसी के सामने , वरन पीठ पीछे लोग बुराई ही करते हैं एक दुसरे का । श्री राधे । :- पूज्यनीयां रासेश्वरी देवी जी के प्रवचन का सार ।

ब्रह्मा ने सृष्टि के विकास के लिए दस मानस पुत्र उत्पन्न किए। इन्हें प्रजापति कहा गया।

श्री महाराज जी :- ब्रह्मा ने सृष्टि के विकास के लिए दस मानस पुत्र उत्पन्न किए। इन्हें प्रजापति कहा गया। उनमें प्रथम है-मरीच। महर्षि कश्यप प्रजापति मरीच के पुत्र हैं ।   महर्षि कश्यप समस्त जगत के पिता स्वरूप हैं। सारे प्रणियों की उत्पत्ति इन्हीं से हुई है। इसलिए सभी जीव भाई-भाई हैं । महर्षि कश्यप की तेरह पत्नियाँ थीं। दक्ष प्रजापति ने अपनी तेरह कन्याओं का विवाह महर्षि कश्यप के साथ किया। इन तेरह कन्याओं के नाम इस प्रकार है-अदिति, दिति दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा, प्राधा, इरा, विनिता, कपिला, मनु एवं कद्रु । इन तेरह पत्नियों से महर्षि की इतनी संतानें हुई कि उस समय रिक्त पड़ी यह पृथ्वी मानव, दानव, देव तथा नाना प्रकार के पशु-पक्षियों कीट पतंगों , वृक्षों एवं लता पताओं घास-फुस फुल आदि से भर गई। महर्षि कश्यप की प्रिय पत्नी अदिति से इंद्र, वरुण, अग्नि, वायु, सूर्य आदि सभी देवता उत्पन्न हुए।  और दिति के दो पुत्र हिरण्याक्ष एवं हिरणकश्यप तथा एक पुत्री सिंहिका हुई। इन दोनों महान दैत्यों का वध करने हेतु भगवान ने दो बार अवतार लिया। दैत्य हिरण्याक्ष का वध करने के लिये वराह अवत...