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।।स्वामीं श्री कृपालु जी महाराज।।

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हमारे श्री महाराज जी जो कि पंचम मूलजगद्गुरू उत्तमई , श्रीमत्पदवाक्यप्रमाणपारावरीण , वेदमार्गप्रतिष्ठापनाचार्य, निखिलदर्शनसमन्वाचार्य सनातनवैदिकधर्मप्रतिष्ठापनसत्संप्रदायपरमाचार्य, भक्तियोगरसावतार , भगवदनन्तश्रीविभूषित श्री १००८ स्वामीं श्री कृपालु जी महाराज हैं ।  जो स्वयं परम चरम तत्त्व हैं , इन्होने अपने पुर्ववर्ति चारो मुल जगतगुरूओं ( श्री शंकराचार्य जी, श्री रामानुजाचार्य जी , श्री निम्बारकाचार्य जी और श्री माध्वाचार्य जी ) के एक पक्षिय सिद्धांतों को विना खारिज किए हुए , उनके अद्वेत्, द्वेत, द्वेताद्वेत, विशिष्टा द्वेत सिध्दांत ज्ञानों का विना खंडन करते हुए सभी का समन्वाकरण करते हुए कलिमल ग्रसित हम पतित जीवों के अज्ञानता को दुर करने का अथक प्रयास किया हैं , अपने पुर्ववर्ति जगद्गुरूओं के ज्ञान के वास्तविक अर्थों को आसान बनाकर , आसान शब्दों में चारो वेदों , पुराणों , उपनिषदों , गीता , श्री मद्भागवद् , श्री वाल्मिकि रामायण ,तुलसीकृत रामायण , चैतन्यचरितामृत आदि ग्रंथों का प्रमाण प्रस्तुत करते अंत में सगुण साकार पुर्ण ब्रह्म श्रीराधाकृष्ण की हीं उपासना पर वल दिए हैं ।  भग...

संत दर्शन का लाभ

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संत दर्शन का लाभ:- मै यह श्री महाराज जी के कृपा से यह सुना और आपको सुना रहा हुं जो अक्छरस सत्य है. बड़ा प्रेरक है  "एक बार नारद जी भगवान कृष्ण से पुछा की " हे प्रभु सन्त दर्शऩ का लाभ कृपा करके वतलाए" भगवान ने कहा "हे नारद पास के गांव मे नाली में एक कीड़ा रहता है तुम उससे जाकर यह सवाल करो , वह तुम्हे संत दर्शन का लाभ वताएगा" अब नारद जी खुद एक ज्ञानी उनको यह वात प्रभु का वड़ा अजीव लगा की मुझे नाली का कीड़ा क्या वतलायगा फिर भी प्रभु का आदेश समझ कर वे उस कीड़े से मिले और संत दर्शन का लाभ पुछा. नाली का कीड़ा को बड़ा आश्चर्य हुआ की भगवान को मेरा भी भान है , वह विभोर हो गया और नारद जी को वड़ी विनम्रता के साथ उत्तर दिया की  " हे मुनी वर मै एक तुक्छ प्राणी आप को संत दर्शन का लाभ कैसे वतलाऊ , हा इतना वतला सकता हुं की सामने वाले पेड़ की डाली पर आज से ठीक तीन माह बाद एक चिड़ियां बैटेगी वह आपको संत दर्शन का लाभ अवश्य वतला देगी "  इतना कह कर वह कीड़ा अपना प्राण उसी छण छोड़ दिया. नारद जी अब तीन महीने इन्तजार के बाद उस पेड़ के पास गय,  वास्तव मे एक चिडियाँ वहा बैठी म...

भक्ति रस से ओत प्रोत ।।एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन ।धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ।।

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भक्ति रस से ओत प्रोत ।। एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन । धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ।। यहां तुलसीदास जी लंका का प्रसंग बता रहें हैं । वे कहते हैं - पता नहीं क्यों मुझे यह प्रसंग और भगवान का यह रूप बड़ा सुंदर लगता है, जब लंका में प्रभु राम पहुँचे और एक पर्वत के शिखर की ऊँचाई पर बैठ गए । सुबेल है उस पर्वत का नाम । तुलसीदास जी कहते हैं कि उस कृपा के रूप का जो भी नारी-नर स्मरण , ध्यान करते हैं वे बड़े धन्य हैं । इस पर प्रभु राम ने तुलसीदास जी से पुछा - क्यों, तुम्हे मेरा अयोध्या का रूप पसंद नहीं आया ? मिथिला का मधुर रूप पसंद नहीं आया ? अरे चलो , चित्रकूट का बनवासी रूप बड़ा बिचित्र सुन्दर है , वही पसंद आ जाता ? लेकिन तुझे लंका के मेरे इस रूप में ऐसा क्या आकर्षण प्राप्त हुआ कि तूने इस चौपाई को लंका कांड में लिखा है । ऐसी क्या बात है यहां ?  इस पर तुलसीदास जी कहते हैं - देखिय प्रभु ! यदि मैं अयोध्या का चिन्तन करूँगा तो मुझे अपने ह्रदय को अयोध्या बनाना पडेगा । यदि मिथिला की आपकी मधुर लीलाओं का चिन्तन करूँगा तो मेरा ह्रदय मधुर होना चाहिए । यदि चित्रकूट के उस संन्यासी-योगी र...

मानव देह का महत्व- श्री कृपालु महाप्रभु जी ।

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मानव देह का महत्व मानव देह का महत्व :- संसार का प्रत्येक जीव कर्मशील दिखाई देता है | पशु - पक्षी , कीट- पतंग सभी तो कर्म करते हैं | यहाँ तक कि स्वर्ग के देवता भी कर्म करते हैं | किंतु इनमें से किसी का भी कर्म स्वतंत्र नहीं है | या यूँ कह लीजिए की उनका कर्म परतंत्र है | वो पुरुषार्थ द्वारा ऐसा कर्म नही कर सकते , जिससे वे अपने अनंत जन्मों के संचित कर्म को भस्म कर दें और भविष्य के अनंत काल को बना लें | चूँकि यह कमाई नाम की चीज़ , पुरुषार्थ नाम का तत्व उनके साथ नहीं रह सकता , इसलिए ये सब भोग योनि के अंतर्गत आते हैं | आइए , अब हम मानव योनि पर विचार करें | मानव योनि ही एक ऐसी योनि है , जिसमें आकर हम वास्तव में कर्म कर सकते है | मानव देह बड़ा कमाल का है | एकमात्र मानव देहधारी जीव ही यह शक्ति रखता है कि वह जिस जीव से चाहे अपने अनुरुप कर्म करवा ले , उनको गुलाम बना ले | उनके द्वारा अपनी सेवा ले | पशु-पक्षी , कीट-पतंग , अथवा देवता सभी आनंद चाहते हैं , लेकिन चौरासी लाख योनियों मे यह शक्ति सिर्फ मानव को ही प्राप्त है कि वह अपने सुख के लिए अन्य चेतन जीवों को गुलाम बना ले , अपना दास बना ले | इन चेतन ...

भक्ति बड़ा सरल है, ‌कोई नियम निषेध आदि नहीं।

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ज्ञानमार्ग तो बड़ा कठिन है ‘ग्यान पंथ कृपान कै धारा’ (मानस, उत्तर॰ 111। 1), किन्तु भक्ति बड़ा सरल है, ‌कोई नियम निषेध आदि नहीं- ‘भगति कि साधन कहउँ बखानी सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी ॥’। (मानस, अरण्य॰ 16। 3) भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने जीवों के लिये अपनी प्राप्ति का मार्ग बड़ा सरल बतलाऐं हैं ‒ अनन्यचेता सततं यो मां स्मरति नित्यश:।  तस्याहं सुलभ: पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिन: ॥ (गीता 8। 14) ‘हे पार्थ ! अनन्य भाव वाला जो जीव नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करता है उस जीव के लिये मैं सुलभ हूँ। ’ ज्ञानमार्गपर चलनेवाला तो अपने साधन के बल को मानता है, पर भक्त की यह विलक्षणता होती है कि वह अपने साधन का बल मानता ही नहीं। वो तो शरणागति का भाव रख कर भक्ति करता है।  मैं इतना जप करता हूँ, इतना तप करता हूँ, इतना पुजा पाठ करता हुं, इतना तिरथ करता हुं, इतना ध्यान करता हूँ, इतना सत्संग करता हूँ, इतना दान करता हुं ‒इस तरह भीतर में अभिमान रहने से भक्ति प्राप्त नहीं होती।  जिनका सीधा-सरल स्वभाव है, जो भगवान्‌ के कृपावल पर निर्भर रहते हैं और हरेक परिस्थिति में सेवा भाव में विभोर रहते हैं, उन्हीं को भक्ति प्राप्त...

भगवत्प्राप्ति में बाधक मानस रोग ।

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**भगवत्प्राप्ति में बाधक मानस रोग ******* प्रत्येक जीव ( व्यक्ति) मन के रोगों से ग्रसित है | पर ऐसे विरले हैं जो अपने मन के रोगों को देख पाते हैं | उसका विश्लेषण कर पाते हैं कि हमारे मन में रोग कहाँ है और किस रुप में है कि मन के रोगी को यह प्रतीत ही नही होता कि उसे रोग हुआ है | शरीर में रोग होने पर साधारणतया व्यक्ति को अनुभव होने लगता है कि वह बीमार हो गया है , जिससे स्वाभाविक रुप से उसके मन में स्वस्थ होने की तीव्र आकांक्षा रहती है | परंतु मन का रोगी यह अनुभव ही नहीं करता कि वह अस्वस्थ है मानसिक रुप से | अत: उसमें स्वस्थ होने की प्रवृति ही नही दिखाई पड़ती | इसके साथ एक समस्या और जुड़ी हुई है मन के रोगी के साथ कि वह हर सामने वाले व्यक्ति को मनोरोग से ग्रस्त देखता है | वह यदि स्वस्थता की चिंता भी करता है , तो दूसरों की | इसका तात्पर्य यह है कि स्वयं को पूर्ण स्वस्थ मानता है | इसलिए हम जब भी चर्चा करते हैं , तो दूसरों की बुराई की | इसका मतलब हमें अपनी बुराइयों की प्रतीति ही नहीं हो रही है और हम सोचते है कि सारी बुराइयाँ दूसरे लोगों में ही है , हममें बिल्कुल नहीं है | प्रत्येक व्यक्ति सोच...

चार्वाक् कौन है ? यह स्वर्ग के बृहस्पति हैं । देवताओं के गुरु बृहस्पति, बुद्धि की औथारिटी, उनका ये सिद्धांत है चार्वाक् । चारू-वाक्, मीठी-मीठी लगने बाली वाणी । ये क्या कहते हैं।

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श्री महाराज जी- तो आप लोग चार्वाक् के सिद्धांत से भी नीचे वाले हैं -  चार्वाक् कौन है ? यह स्वर्ग के बृहस्पति हैं । देवताओं के गुरु बृहस्पति, बुद्धि की औथारिटी, उनका ये सिद्धांत है चार्वाक् । चारू-वाक्, मीठी-मीठी लगने बाली वाणी । ये क्या कहते हैं- यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुत: ।।                                                 (चार्वाक्)  "जब तक जियो, सुख से जियो, कर्जा करके घी पियो । मरने के बाद फिर कौन आता है, कौन जाता है , सब बकवास। " ये शरीर को हीं सब कुछ मानते हैं, अपना सुख यानी शरीर का सुख । वैसे तो आप लोग हँसेगे कि ये महामूर्खता , ये बृहस्पति का चलाया हुआ है ?  ऐसा हुआ था एक बार कि देवताओं और असुरों का युद्ध हुआ तो बहुत असुर मारे गए । तो असुरों के गुरु शुक्राचार्य, उन्होंने कहा यह तो बड़ा गड़बड़ हो गया । हमारे तो तमाम असुर मारे गए , अब तो देवता लोग हमेशा दबा लेंगे । तो वो गए ...

भक्ति मार्ग ।

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जो प्यारे भाई बहन ऐसे लोग जो श्री महाराज जी के द्वारा दिए गए तत्त्व ज्ञान से अनभिज्ञ हैं और फेस बुक पर पढ़ कर बहुत से सबाल करते हैं , उनके शंका का समाधान करना  मुझ जैसे क्षूद्र जीव के लिए संभव नहीं है । इसके लिए आपको श्री महाराज जी के पुस्तकों को मंगा कर पुरा पढ़ना पड़ेगा । या उनके प्रचारकों से जुड़ना हीं होगा । श्री महाराज जी जगद्गुरू उत्तमई है । वेद की सभी ऋचाएं पानी भरती है उनके यहां और उनके शरण में हीं रहती हैं हमेशा ।  फिर भी श्री महाराज जी के कृपा से , पुज्यनियां मां के आनूगत्य में थोड़ी बहुत जानकारी जो मुझे है , उस आधार पर केवल इतना हीं कह सकता हुं संक्षेप में कि बहुत सारे लोगों का ९९% का सबाल , कर्म कांड - ज्ञान मार्ग या राज योग से है । श्री महाराज जी ने भक्ति मार्ग को हीं उत्तरोत्तर सरल और उत्तम मार्ग  सिद्ध किएं हैं ।  वेद में अस्सी हजार श्लोक , कर्मकांड-ज्ञानादि पर है और केवल बीस हजार श्लोक भक्ति योग पर है । चूँकि,  'पुराण' वेद से पहले प्रकट हुए और वेद को आसानी से समझने के लिए हीं प्रकट हुए हैं , अत: स्वाभाविक है कि पुराणों में भी ८०% बातें कर्मकांड-ज...

आप सबको एक सच्ची कहानी शेयर कर रहा हुं अपनी मां राधा रानी के बारे में ।

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आप सबको एक सच्ची कहानी शेयर कर रहा हुं अपनी मां राधा रानी के बारे में । ये मेरे ठाकुर और ठकुरानी है मेरे घर और मन के मंदिर में रहते हैं हमेशा ।  मैं पिछले पांच साल से लगातार राधा रानी का मुकुट ठीक करता रहता हुं , उनके मुकुट को बढ़िया से बढ़िया एडेसीभ से पीछे के चुनरी से चिपकाया । पर मेरी ठकुरानी हमेशा मुकुट को निचे झुका लेती हैं । मैं काफी प्रयास किया हजारों बार अबतक , लेकिन वो हमेशा हीं मुकुट को झुका लेती हैं । कभी भी  मुकुट अपने माथे कर सीधा नहीं रहने देती । मैं बहुत मिन्नत किया । उनके उपर थोड़ा प्यार से क्रोध भी किया , पर वो नहीं मानती है । समझाने पर , रोने गिड़गिड़गिराने पर थोड़ा देर रखती है सीधा और जैसे हीं मैं काम करने चला जाता हुं बाहर तो वो मुकुट को झुका लेती हैं । अंत में एक दिन मैं खुब रोया और कहा उनको की अब कि "मैं आपका मुकुट अब सीधा नहीं करूंगा । मैं थक गया , लाख जतन कर लिया , बढ़िया से बढ़िया गोंद लगाया पर आप अपना मुकुट क्यों झुका लेती हैं मैं समझ नहीं पाता हुं ।  तो एक दिन ( कुछ दिन पहले ) वो और ठाकुर जी मेरे सपने में आए और मुझे कहने लगी - " मेरे वेटे मैं ठा...

संसार मे रहो पर ध्यान रहे की संसार आप में न बसे |

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संसार मे रहो पर ध्यान रहे की संसार आप में न बसे |  मशहूर सूफी संत उमर बगदाद में रहते थे। उनके पास रोज बड़ी संख्या में लोग मिलने आते थे। वे सभी से प्रेमपूर्वक व्यवहार करते और यथोचित सत्कार भी करते थे। एक बार एक दरवेश उनके पास पहुंचा। उसने देखा कि कहने को तो उमर फकीर हैं, लेकिन वे जिस आसन पर बैठे हैं, वह सोने का बना है। चारों ओर सुगंध है, जरी के पर्दे टंगे हैं, सेवक हैं तथा रेशमी रस्सियों की सजावट है। रस्सियों के निचले हिस्से में सोने के घुंघरू बंधे हैं जो जमीन तक आ रहे हैं। हवा चलती है तो रेशमी रस्सियां हिलती हैं, और उनके घुंघरू बज उठते हैं। कुल मिलाकर हर तरफ विलास और वैभव का साम्राज्य है।  दरवेश देखकर भौंचक रह गया। उमर उसके सम्मान में कुछ कहते, इसके पहले ही दरवेश बोल उठा-'आपकी फकीराना ख्याति सुन दर्शन करने आया था, लेकिन देखता हूं आप तो भौतिक संपदा के बीच मजे में हैं।' उमर ने कहा-'तुम्हें ऐतराज है तो मैं इसी पल यह सब वैभव छोड़कर तुम्हारे साथ चलता हूं।' दरवेश ने हामी भरी और कुछ ही पलों में उमर सब छोड़कर उसके साथ चल पड़े। दोनों पैदल कुछ दूर चले होंगे कि अचानक दरवेश पीछे मु...

" वेद कहता है कि सबके लिये शुभ कामना होनी चाहिये , एक दो चार के लिये नहीं |

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श्री महाराज जी :- (२२ अप्रैल २०१३) " वेद कहता है कि सबके लिये शुभ कामना होनी चाहिये , एक दो चार के लिये नहीं |  सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया: सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दु:ख भाग् भवेत् || ये वेद मंत्र है | समस्त विश्व में सब सुखी हों , सबका कल्याण हो , सब निरोग हों , ईत्यादि शुभकामनायें सारे संसार के प्रति होनी चाहिये | एक के प्रति हुई या अपने बेटे - बेटी , नाती - पोते लिये हुई और औरों के प्रति दुर्भावना हुई ,ये गलत है | सबमें भगवान् का निवास है , इस फैक्ट को रियलाइज करते हुये सर्वत्र सबके प्रति अच्छी भावना हो, अपने प्रति खराब हो | अगर अपने प्रति भी अच्छी भावना हो गई तो फिर आपका उत्थान नहीं होगा, पतन हो जायगा , अहंकार हो जायगा | तो फैक्ट यही है कि सबमें भगवान् को माने इसलिये सबके प्रति सुन्दर भावना हो और अपना हाल तो वो जानता ही है कि हम अनादिकाल से अपराधी हैं , भगवान् को भूले हुये हैं | इसीलिये भगवान् नहीं मिले हमको | अनन्त पाप किये बैठे हैं ये सब माने | हमें अपने आपको ठीक करना है और किसी को नही देखना | देखना है तो अच्छी भावना से कि इसके अन्दर भगवान् हैं | हम स...

भगवान की तीन शक्तियों में एक परा, दूसरा क्षेत्रज्ञ और तीसरी माया है ।

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श्री महाराज जी :- भगवान की तीन शक्तियों में एक परा, दूसरा क्षेत्रज्ञ और तीसरी माया है । परा शक्ति को ही स्वरुप शक्ति कहते हैं । इसे योगमाया भी कहते हैं । भगवान की यह निज विशेष शक्ति है । जो असंभव को भी संभव कर सकती है । भगवत्प्राप्ति के बाद यह स्वरुप शक्ति सबको प्राप्त होती है । जिससे - अपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षु: स श्रृणोत्यकर्ण:। स वेत्ति वेद्यं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरग्र्यं पुरुषं महान्तम् ।। (श्वेता. ३-१९) एक इन्द्रिय से सब इन्द्रिय का विषय ग्रहण कर सकते है और वह एक इन्द्रिय नहीं है तो भी -  बिनु पग चलइ सुनइ बिनु काना । कर बिनु कर्म करइ विधि नाना ।। आनन रहित सकल रस भोगी । बिनु जिह्वा वक्ता बड़ जोगी ।। तन बिनु परस नयन बिनु देखा । ग्रहइ 'घ्राण बिनु वास असेसा ।। असि सब भाँति अलौकिक करनी । महिमा जासु जाइ नहीं बरनी ।। असंभव को संभव करने वाली -  'कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ: '। इसे कहते हैं समर्था शक्ति, स्वरुप शक्ति या पराशक्ति । दूसरी शक्ति है क्षेत्रज्ञ । इसी का नाम जीवशक्ति है । हम जीव पराशक्ति युक्त श्रीकृष्ण के अंश नहीं हैं क्योंकि हम मायाधीन हैं किन्तु ज...

पोस्ट सं- आठ ( अंतिम अध्याय) *** राम कौन हैं ****

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पोस्ट सं- आठ ( अंतिम अध्याय) *** राम कौन हैं **** श्री महाराज जी :-  राम के चार स्वरूप । वाल्मिकि रामायण कहती है।-  तत: पद्म पलाशाक्ष: कृत्वात्मानं चतुर्विधम् । [वा.रामा] ये लक्ष्मण , भरत, शत्रुघ्न ये कोई महापुरुष नहीं हैं। सब राम हैं । राम अपने आप चार बन गए , और वही चारों फिर कृष्णावतार में श्रीकृष्ण, बलराम, अनिरुद्ध, प्रद्युम्न यह चतुर्व्यूह बन कर के प्रकट हुए । और वही ब्रम्हा, विष्णु, शंकर , रामावतार में स्तुति करने गए । वहीं कृष्णावतार में स्तुति करने गए । इसलिए ऐसा नामापराध न कमाएं ।  अगर कोई भोले भाले लोग शास्त्रों वेदों को नहीं पढ़े हैं तो वे हमारी ये प्रार्थना को स्वीकार करें , और थोड़ा भी अंतर न मानें कि दोनों बराबर हैं ऐसा नहीं कहना । दोनों एक हैं ऐसा कहना । बराबर का मतलब तो दो पर्सनालिटी हो गई , पर्सनालिटी दो नहीं हुई । एक ही पर्सनलिटी के अनंत रूप हैं ।  अनंत नाम और रूपाय । इस प्रकार भगवान राम को रो कर पुकारो । रो कर पुकारो । खाली ऐसे जो आप लोग मंदिरों में गा देते हैं। भये प्रगट कृपाला दीन दयाला .... ऐसे नहीं । रोक कर पुकारो । तुम्हें मांगना है ना भी...

** पोस्ट सं - सात**** श्रीराम कौन हैं ?

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** पोस्ट सं - सात**** श्रीराम कौन हैं । श्री महाराज जी -  नेम धर्म आचार तप योग यज्ञ जप दान । भेषज पुनि कोटिन करिय , रूज न जाहिं हरि जान । 'रघुपति भक्ति सजीवन मूरी ' बस एक दवा है । साधक सिद्ध विमुक्त । देखो क्या शब्द है ' विमुक्त ' साधक सिद्ध विमुक्त उदासी । कवि कोविद कृतज्ञ सन्यासी ।। जोगी सूर सुतापस ज्ञानि । धर्म निरत पंडित विज्ञानी ।। तरई न बिनु सेएं मम स्वामी । राम नमामि नमामि नमामि ।। चैलेंज है तुलसीदास जी महाराज का । वारी मथे बरू होय धृत सिकता ते बरू तेल । बिनु हरि भजन न भव तरिय , यह सिद्धांत अपेल ।। विनिश्चितं वदामि । चैलेंज कर रहे हैं बार-बार भक्ति से ही राम मिलेंगे । हां तो आप लोग समझ गए ,राम ब्रह्म है। उन्हीं का रूप परमात्मा और ब्रह्म का है। वह भगवान है । उनका शरीर भी सच्चिदानंदघन है, और उनकी प्राप्ति भी कर्म, ज्ञान, योग से असंभव, केवल भक्ति से ही होगी । वो राम और कृष्ण ये दो तत्त्व नहीं हैं । तत्त्व एक है । यह बात हमारे बहुत से साधू भाइयों को भी नहीं पता है। वो कहते हैं भाई ऐसा है कि सब अपने-अपने इष्ट को नमन करते...

**पोस्ट संख्या - छः** राम कौन हैं ******

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***पोस्ट संख्या - छः** राम कौन हैं ****** श्री महाराज जी -   विष्णुर्महान् स इह यस्य कला विशेषो-  इसलिये जब देखा विराट रूप तो-  भिन्न भिन्न प्रतिलोक विधाता । भिन्न विष्णु शिव मनु दिशि त्राता ।। ब्रह्मा विष्णु, शंकर , मनु सब भिंन्न भिंन्न देखा, अनंत ब्रह्मांडों में अनंत मात्रा के, और भगवान राम को जब देखा एक ब्रह्मांड के विष्णु ने तो- रमा समेत रमा पति मोहे । मोहित हो गए । रमा भी और रमा पति भी । तो ये विष्णु एक ब्रह्मांड वाले तो राम के अण्डर में हैं । उनके गुणावतार हैं । अनंत कोटी ब्रह्मांड नायक जो बैकुंठाधिपति हैं वो महाविष्णु हैं । वो राम के हीं अभिन्न रूप हैं । ऐश्वर्य के रूप हैं, चारभुजा है उनके। ब्रह्मा ने कहा था -चतुर्भुज:। आप चार भुजा वाले हैं ।भवान्नारायणों देव: । आप नारायण हैं, ये नारायण शब्द भी भ्रामक है । क्योंकि विष्णु का नाम भी नारायण है। और महाविष्णु को भी नारायण कहते हैं, और राम कृष्ण को भी नारायण कहते हैं । यह शब्द जाल है ये पंडितों के बस का नहीं है । संत महात्मा लोग इसको हल करते हैं । तो भगवान राम वेदों के अनुसार पूर्णतम पुरुषोत्तम भगवान हैं ।...

आध्यात्मिक इतिहास के मूल जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की विलक्षण दार्शनिकता

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आध्यात्मिक इतिहास के मूल जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की विलक्षण दार्शनिकता :-  संसार के बड़े - से - बड़े शास्त्रकारों ने धर्म , अर्थ , काम , मोक्ष - इन चार पुरुषार्थों को ही जीव का लक्ष्य बताया है | उन्होंने इन लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु अपने-अपने सिद्धान्त रखे हैं | किन्तु श्री कृपालु जी महाराज जी की तत्त्वज्ञता इन सबों से अद्वितीय है; भिन्न है | उनके अनुसार पुरुषार्थ चतुष्टय जीव को अंतिम लक्ष्य नहीं दे सकते क्योंकि जीव श्रीकृष्ण का नित्य दास है | उसके दासत्व की पूर्णता और प्रमाणिकता श्रीकृष्ण का प्रेम प्राप्त कर उनकी सेवा करने में हैं |  मोक्ष को उन्होंने दिव्य पुरुषार्थ माना है , किन्तु अंतिम नहीं | और शेष तीन मायिक पुरुषार्थ है :- धर्म , अर्थ , काम |  जीव ईश्वर का अंश है | यह 'गीता ' ' रामायण ' द्वारा प्रमाणित है -                          ममैवांशो जीवलोके जीवभूत: सनातन: | - गीता                           ईश्वर अंश जीव अविनाशी ...

जगद्गुरुत्तम संदेश ( हमेशा याद रखें यह सिद्धान्त ) :-

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जगद्गुरुत्तम संदेश ( हमेशा याद रखें यह सिद्धान्त ) :-  * द्वेष करने वाले व्यक्ति के प्रति भी द्वेष न करें | उदासीन रहे | * आज कोई नास्तिक भी है तो कल उच्च साधक बन सकता है अत: साधक यह न सोचे कि इसका पतन सदा को हो चुका | सूरदास संत उदाहरण हैं | * गुरु की सेवा करने वाला तो साधक ही है, उसके प्रिय होने के कारण उससे द्वेष करना पाप है | * सचमुच भी कोई अपराधी हो तो भी मन से भी उसके भूतपूर्व अपराधो को न सोचे , न वोले | * संसार में भगवत्प्राप्ति के पूर्व सभी अपराधी हैं |  बड़े बड़े साधकों का पतन एवं बड़े बड़े पापियों का भी उत्थान एक क्षण में हो सकता है | * सब में श्री कृष्ण का निवास है अत: उनको ही महसुस करें |  * मन को सदा श्री कृष्ण एवं उनके नाम , रुप , गुण , लीला , धाम, तथा उनके स्वजन में ही रखना है | * अपने शरण्य ( हरि एवं गुरु ) को सदा अपने साथ रक्षक रुप में मानना है |  * परदोष दर्शनादि कुसंगों से बचना है | * दोष चिन्तन करते हुये शनै शनै बुध्दि भी दोषयुक्त हो जाती है | * परदोष दर्शन ही स्वयं के सदोष होने का पक्का प्रमाण है | * हमारा निन्दक हमारा हितैषी है | * निन्दनिय के प...

"जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज"...(जगद्गुरुत्तमई का परिचय)......ये कौन हैं?

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"जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज"...(जगद्गुरु परिचय)......ये कौन हैं? "भक्ति की अंतिम परिणति का नाम महाभाव और महाभाव का मूर्तिमान विग्रह हैं श्री राधा। श्री कृष्ण रसिक शिरोमणि हैं,सम्पूर्ण अलौकिक रसों की निधि हैं। भक्ति और रस दोनों का अपूर्व सम्मिश्रण हैं ये 'कृपालु'।" बात 14 जनवरी 1957, की है। काशी के मूर्धन्य,शास्त्रज्ञ विद्वानों की सभा तथा उपस्थित विशाल जनसमूह,इनके मध्य एक तेजस्वी युवक उपस्थित हुए.....जिनकी आयु लगभग 34 वर्ष की होगी। उन्होने अपनी अलौकिक वाणी और प्रतिभा से सभी को मंत्र-मुग्ध कर दिया। गौर वर्ण,काले घुंघरारे बाल,बिजली के समान चमकता शरीर,प्रेम रस परिप्लुत सजल नेत्र,सभी का चित्त आकर्षित हो गया। सब कुछ भूल कर एकटक सब इनकी और देखते रह गये। कौन हैं ये? इनके रोम-रोम से प्रेम निर्झरित हो रहा है। इनको देखते रहो,देखते रहो,नेत्रों की तृप्ति नहीं होती बल्कि वे और अधिक प्यासे हो जाते हैं। उनके कठिन वैदिक संस्कृत में दिये गये 9 दिन के विलक्षण प्रवचन को सुनकर विद्वत समाज के आश्चर्य की सीमा नहीं रही। सभी के मन में जिज्ञासा हुई,'ये कौन है?...

****राम कौन हैं *** पोस्ट संख्या - पाँच श्री महाराज जी :-

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****राम कौन हैं *** पोस्ट संख्या - पाँच  श्री महाराज जी :- सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होय।  प्रभु बंधन रण महंँ निरखि । गरूड़ सरीखे पर्सनालिटी को मोह हो गया। ये राम । भव बंधन से छूटहिं नर जपि जाकर नाम । एक तुच्छ राक्षस उसने नागपाश में बांध लिया । ये राम भगवान नहीं हो सकते, कोई बड़ी पर्सनालिटी हैं ठीक है, भगवान - उगवान नहीं । महामोह ऊपजा उर तोरे । सब जगह भटकते फिरे विचारे । लग गई माया । हांँ । नहीं समझ पाए । अरे कोई नहीं समझ सकता।  देखा हम आपको बताएं एक छोटी सी बात । सीता हरण हुआ, हांँ । तो भगवान लक्ष्मण के साथ सीता को ढूंढने निकले पैदल। और किस तरह ढूंढ रहे हैं । अरे आज कल भी तमाम लोगों की स्त्रियां खोती है, बेटी खोती है , बहन खोती है, लेकिन उसके खोजने का तरीका होता है । पुलिस में खबर करो , रेडियो में, इसमें-उसमें , सब तरह के तरीके हैं न- ये वृक्षा: पर्वतस्था गिरिगहन लता वायुना वीज्यमाना । रामोअ्हं व्याकुलात्मा दशरथ तनय: शोक शुक्रेण दग्ध:। बिम्बोष्ठी चारूनेत्री सुविपुल जघना बद्ध नागेन्द्र काञ्ची। हा सीता केन नीता मम ह्रदय गता को भवान् केन दृष्टा । ऐ पेड़ों लताओं...

महाराज जी के श्री मुख से शबरी प्रसंग :- प्रभु श्रीराम का आदर- सत्कार कर शबरी हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी |अपने प्रभु को देखा - उसका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया | वह कहने लगी |

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महाराज जी के श्री मुख से शबरी प्रसंग :-  प्रभु श्रीराम का आदर- सत्कार कर शबरी हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी | अपने प्रभु को देखा - उसका प्रेम अत्यन्त बढ़ गया | वह कहने लगी | अधम ते अधम अधम अति नारी | तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी || तब श्रीराम जी बोले - हे भामिनि ! मैं तो केवल भक्ति का सम्बन्ध मानता हूँ | जाति , पाँति , कुल , धर्म , बड़ाई , धन-बल , कुटुम्ब , गुण एवं चतुराई - इन सबके होने पर भी भक्ति रहित मनुष्य जलहीन बादल सा लगता हैं | उन्होने शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश किया | कहा- मेरी भक्ति नौ प्रकार की है - नवधा भक्ति कहहुँ तोहि पाहीं | सावधान सुनु धरु मन माहीं || प्रथम भक्ति संतन कर संगा | दूसरि रति मम कथा प्रसंगा || गुरुपदपंकज सेवा तीसरि भक्ति अमान | चौथि भक्ति मम गुन गन करइ कपट तजि ज्ञान || मंत्र जाप मम द्दढ़ विश्वासा | पंचम भजन सो वेद प्रकासा || छठ दम सील विरति कहु करमा | निरत निरन्तर सज्जन धरमा || सातवँ सम मोहि मय जग देखा | मोते संत अधिक कर लेखा || आठवँ जथा लाभ संतोषा | सपनेहुँ नही देखहिं परदोषा || नवम सरल सब सन छल हीना | मम भरोष हिय हरषन दीना || नव महँ एकहुँ जिन्ह के होई | नारी पु...