गुरू शिष्य तथा साधना का विज्ञान

गुरू शिष्य तथा साधना का विज्ञान :- 
एक आध्यात्मिक साधना के रहस्य कि बात आज बतलाता हूं मैं, और एक बात और बता दूं सबसे पहले कि एक एक शब्द मैं स्वयं नहीं लिख रहा हूं , इस पोस्ट का एक एक शब्द अपने गुरूदेव श्री कृपालुजी महाप्रभु के प्रेरणा तथा उनके द्वारा प्रेरित होकर लिख रहा हुं मैं :- 
हरि गुरू ( Divine Mahapurush ) यानि श्री कृपालुजी महाप्रभु जैसे श्रोत्रिए ब्रह्मनिष्ठ रसिक संत शिरोमणि तथा उसमें भी श्री राधाकृष्ण के दिव्य प्रेम रस सार तत्व से ओत-प्रोत अवतारी महापुरूष केवल दिव्य ज्ञान के श्रोत ही नहीं होते वल्कि ऐसे संत असीम करूणा , असीम प्रेम, असीम दिव्य शक्ति तथा असीम कृपा से ओत-प्रोत होते हैं । 
इनके अंग प्रत्यंग से प्रेम तथा कृपा कि दिव्य रस धारा बहती रहती है । 
इनके पास दिव्य शक्ति नहीं होती वल्कि ये स्वयं दिव्यतम शक्ति होते हैं । 

ऐसे गुरू को पाना , उनको जानना , उनके प्रति गहरी आस्था , उनके प्रति असीम श्रद्धा तथा दृढ़ विश्वास उनसे प्रेम उनके कृपा के बिना संभव नहीं । केवल अंदर से जागृति कि जरूरत है , कृपा अपने आप होने लगेगी । 

श्री महाराज जी जैसे असाधारण संत इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं अबतक , गौरांग महाप्रभु भी वही थे । लेकिन उस समय उनका अवतार केवल अधिकारी जीवों के कल्याण तथा प्रेम दान के लिए हुआ था । 

लेकिन श्री कृपालुजी महाप्रभु का अवतार हम जैसे अनाधिकारी जीवों के लिए हुआ है जिनके अंदर भगवद् प्रेम कि चाहत कई जन्मों से थी लेकिन अज्ञानता के कारण रास्ता नहीं मिला । कोई बताने वाला सक्षम गुरू नहीं था हमारे लिए , ऐसे जीवों को ही मार्ग बतलाने के लिए तथा परम कल्याण हेतु श्री महाराज जी का अवतरण इस धरा धाम के पावन भूमि मनगढ धाम में हुआ । 

विदित हो कि मनगढ धाम को ही इन्होंने अपने अवतरण के लिए क्यों चुना तो इसके पीछे रहस्य यह है कि मनगढ धाम एक परम निष्काम भक्त का अपने ईष्ट श्री सीताराम के प्रति पूर्ण शरणागति का परम पावन स्थल रहा है जिसका इतिहास रामायण काल में दर्ज है । मनगढ धाम प्राचीन काल में ( रामायण काल में ) श्रृंगवेरपुर के नाम से प्रसिद्ध था । 

इसी स्थल पर गंगा नदी के किनारे एक निष्काम भक्त केवट पर उसके शरणागति के पराकाष्ठा के उपरांत भगवान कि कृपा हुई थी । 
केवट इसी श्रृंगवेरपुर में भगवान का दर्शन किया , उनकी शरणागति की तथा भगवान का प्रेम प्राप्त किया । अत: यह स्थल भगवान श्री सीताराम के असीम प्रेम तथा करूणा का गवाही रहा है । 

अत: श्री महाराज जी जो स्वयं श्री राधाकृष्ण के अवतार हैं तथा यही दोनों रामायण काल में श्री राम तथा सीता भी बने थे , ने अपने प्रति शरणागत एवं निष्काम भक्त केवट जी को प्रेम दान दिया था। 

अत: यही कारण था कि इस कलयुग में स्वयं भगवान श्री कृष्ण अपने मिश्रित अवतार ( दोऊ युगल अवतार श्री राधा तथा कृष्ण , यानि श्री राम तथा सीता दोनों एक ही बात है ) श्री कृपालुजी महाराज जी के रूप में अवतार के लिए इस स्थान को चुना, तथा यहीं से उन्होंने भगवान एवं गुरू के प्रति निष्काम प्रेम एवं शरणागति के मार्ग के सिद्धांतों को भावुक जनों में प्रचार प्रसार किया । 

आज लाखों ऐसे जीव हैं जो उनसे प्रेम दान प्राप्त किया है लेकिन स्वयं को संसार से छुपा कर रखे हुए हैं । यह इसलिए कि अपने गुरू से दिव्य प्रेम के प्राप्ति के बाद इसे सार्वजनिक करना पूर्णत: वर्जित है । 

अज्ञानी लोग , अश्रद्धावान , अविश्वासी लोग पुछते है कि कितने को भगवद् प्राप्ति हुई है तो मैं बतला दूं कि वास्तविक भगवद् प्राप्त शिष्य गुरू द्वारा प्राप्त प्रेम दान को कभी सार्वजनिक नहीं कर सकते है । 
भगवद् प्राप्त शिष्य भी जबतक आयु शेष है इस शरीर को इस धरा धाम से छोड़ कर नहीं जा सकता । 

भगवद् प्राप्ति का लक्षण भक्त में आंतरिक स्तर पर होता है न कि बाहरी स्तर पर, अत: यह पहचानना कठिन है कि श्री महाराज जी से कौन कौन शिष्य अनुग्रहित हो चुका है अबतक, प्रेम
 दान प्राप्त कर चुके हैं और कौन नहीं ?

अंदर के मशीन के स्तर पर परिवर्तन का मतलव शिष्य के अंत:करण चातुष्ट्य ( मन बुद्धि चित्त तथा अहंकार ) के स्तर पर बहुत भारी परिवर्तन होता है जो वो बाहर व्यक्त नहीं कर सकता , क्योकिं ऐसा करना गुरू आज्ञा के खिलाफ है ।
एक कारण यह भी है यह प्रकट हो जाने पर लोग उसके पीछे पड़ जाएंगे और उसको पुजना शुरू कर देंगे । जो वर्जित है , भगवद् प्रेम दान प्राप्त जीव की सभी भौतिक कामना स्वत: समाप्त हो जाती है । वो न तो किसी प्रकार का संसारिक धन और ना हीं संसारिक मान सम्मान कि लेश मात्र कि कोई कामना रखता है , भगवद् प्रेम प्राप्त शिष्य संसार से कोई अपेक्षा नहीं रखता , यह सब स्वभाविक रूप से प्रेम दान के पहले ही भस्म हो जाते हैं । तो भला वो क्यों स्वयं को बाहर व्यक्त करें भला ? 
और जो बाहर व्यक्त करता है वो भीतर से खाली होता है , इसी को पाखंड कहते हैं । 

प्रेम दान पाने के बाद शिष्य के अन्तर्मन के स्तर पर सिद्धा भक्ति कि शुरूआत होती है । 
ऐसी भक्ति शिष्य के अंत:करण के स्तर पर प्रेम दान के पश्चात निरंतर अंदर ही अंदर चलता रहता है । गुरू कृपा से शिष्य के पंचकोष कि पांचों ग्रंथी कट जाती है । 
गुरू कृपा से शिष्य का त्रिगुण , त्रिताप , पंचक्लेश, पंचकोष आदि प्रेम दान के एक सेकेंड के करोड़ों हिस्सा पहले हीं भष्म हो जाते हैं , तत्पश्चात दिव्य प्रेम का प्रकटीकरण आंतरिक स्तर पर होता है न कि बाहरी स्तर पर । 

प्रेम दान प्राप्त शिष्य स्वयं को विल्कूल छुपा कर रखता है संसार से , इसलिए संसार में वो पुर्ववत जीवन बिताता है, पुर्व के भांति लोकवत् व्यवहार करता रहता है , लेकिन अंदर ही अंदर वो प्रतिदिन बढ़ते हुए दिव्य प्रेम , सुख तथा आनन्द का अनुभूति करता रहता है । नित्य नवीन नई दिव्य उर्जा तथा भगवद् प्रेम से ओत प्रोत भक्त का मन गहरे प्रेम कि अनुभूति करता रहता है । 

ऐसे शिष्य का पुर्व जन्मों के तमाम पाप पुण्य भस्म हो जाते हैं गुरू कृपा से लेकिन वो इस जन्म में, यानि प्रेम दान से पहले के संचित कर्मो के भोग को सहर्ष भोग लेना चाहता है । 
यह इसलिए कि इस जन्म के कर्मों का भोग वो इसी जन्म में भोग कर इन कर्मों के बंधन से मुक्त होकर सदा के लिए गोलोक गमन करना चाहता है । 

इसलिए आपने देखा होगा कि कभी कभी उत्तम कोटि का शिष्य भी गंभीर भोग यानि भौतिक सुख‌ या दुख या दोनों प्रकार का भोग बारी बारी से भोगते देखा जाता है । लेकिन साधारण लोग , अज्ञानी तथा श्रद्धाहीन लोग समझते हैं कि ये तो इतना बड़ा समर्पित साधक था फिर भी इसके जीवन में कष्ट क्यों आया तथा किसी किसी को भौतिक सुख भोगते पाता है तो सोचता है कि केवल इस पर ही कृपा हुई है जबकि ऐसी बात नही है , भौतिक सुख या दुख भगवद् कृपा नहीं वल्कि यह खुद के पुर्व कर्म से बने प्रारब्ध का भोग होता है जिसे भोग कर निवृत्त होना इसी शरीर में आवश्यक है शिष्य के लिए ? 

तो ये इसलिए कि वो समर्पित शिष्य जो अपने गुरू से प्रेम दान प्राप्त कर चुका है वो अपने प्रारब्ध को इसी शरीर में भोग कर इस शरीर से मुक्त होना चाहता है, आवागमन से मुक्त होना चाहता है । 

अत: आज से किसी भी समर्पित शिष्य को जब भी कोई कष्ट भोगते हुए आप देखें या किसी को भौतिक सुख पाते देखें तो उनके प्रति गलत परसेप्शन न बनाया करें । 
यह सब प्रेम दान प्राप्त शिष्य की आंतरिक इच्छा से होती है कि मैं अपने इस जन्म में अब से पहले किए कर्मों को गोलोक जाने से पहले इसी शरीर में भोग लूं ताकि कोई भी भोग वांकि न बचे जिसको भोगने के लिय यहां आना परे । 

एक बात और बता दूं अपने गुरू से बेहद प्रेम करें , वो भी निष्काम और विल्कूल निस्वार्थ। 
ऐसे भगवद् तत्व गुरू से निष्काम प्रेम , निस्वार्थ प्रेम ही शरणागति है । 

इस संसार कि कोई वस्तु इतना अनमोल नहीं है जिसकी कामना भला कोई वास्तविक शिष्य करेगा ! 
इस मायिक जगत का यानि सातों स्वर्ग तक के सभी विषय वस्तु पद प्रतिष्ठा संबंध तथा सुख नश्वर है , दुखदायक है अंतत्वोगत्वा , इनसे सुख कि अभिलाषा करना मुर्खो का काम है, अज्ञानियो का काम है , ऐसे मायिक वस्तूओ की अभिलाषा करना घोर अज्ञानियों तथा मुर्खो का काम है । श्री कृपालुजी महाप्रभु जैसे दिव्य पर्सनालिटी से प्राप्त तत्वज्ञानियों का नहीं । 

मैं तो केवल यही कहुंगा कि श्री महाराज जी से अथाह प्रेम करें , हर क्षण उनसे केवल दिव्य प्रेम प्राप्ति कि याचना करते रहें । उनका रूपध्यान , चिंतन मनन हर क्षण करते रहें। 

ध्यान रहे ऐसे साधना मार्ग में माया बहुत लुभाती है साधन मार्ग पर कभी कभी , लेकिन भुल से भी उस तरफ मोह न करें , रूख न करें , उदसिन रहे । हर क्षण तत्वज्ञान से काम लें । मन में उठने वाली प्रत्येक मायिक कामनाओं को तत्वज्ञान से काटते रहे, गुरू कृपा से जीवन चलाने के लिए, परिवारिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए प्रारब्ध बस जो भी भौतिक साधन प्राप्त होता रहे ताउम्र उसी में संतोष करें । अपनी ओर से कोई भी मायिक कामना अपने गुरू तथा ईष्ट के सामने विल्कूल प्रकट न करें । 
यह दृढ़ता से मान लें कि उनकी कृपा से जो उन्हें मंजूर है मेरे लिए उसी से वांकि जीवन , फर्ज , उत्तरदायित्व का निर्वहन करते हुए जीवन जीना है ,चाहे कुछ भी हो जाए कोई भी संसारिक विषय वस्तु कि कामना हरगिज नहीं करेंगे । 
इसी स्थिति का नाम है शरणागति, ऐसा करते करते अपने आप वो दिव्य घटना गुरू कृपा से जरूर घटेगी जब सदा के लिए हम मालामाल हो जाएंगे । यह दृढ़ विश्वास होना आवश्यक है । 
: - संजीव कुमार।

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